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कचरे से मुक्त होगा देवभूमि का कोना-कोना: 'स्वच्छ उत्तराखण्ड मिशन का खाका तैयार, ढिलाई पर तय होगी निकायों और पंचायतों की जवाबदेही

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देहरादून। उत्तराखण्ड को स्वच्छ, सुंदर और पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने एक बड़ा और दूरगामी कदम उठाया है। 'स्वच्छ उत्तराखण्ड मिशन 2026-2030' की नई कार्ययोजना के तहत अब केवल कागजी दावों से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर ठोस परिणाम दिखाने होंगे। इस बार अपशिष्ट प्रबंधन का दायरा केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण पर्यटन स्थलों, अर्द्धशहरी क्षेत्रों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों की भी सीधी जवाबदेही तय की जाएगी।

उत्तराखंड में ठोस और प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सरकार ने नई कार्ययोजना तैयार करने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं। स्वच्छ उत्तराखंड मिशन 2026-2030 के तहत अब केवल शहरी क्षेत्रों ही नहीं, बल्कि अर्द्धशहरी इलाकों और पर्यटकों की अधिक आवाजाही वाले ग्रामीण पर्यटन स्थलों में भी कचरा प्रबंधन की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही नगर निकायों, ग्राम पंचायतों, निजी संस्थानों और अधिक मात्रा में कचरा पैदा करने वाले प्रतिष्ठानों की जिम्मेदारियां स्पष्ट करने की तैयारी है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता में आयोजित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन राज्य स्तरीय कार्यान्वयन एवं निगरानी समिति की बैठक में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 और प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के संशोधित प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में कचरा प्रबंधन से जुड़ी परियोजनाओं की प्रगति, क्रियान्वयन में आ रही समस्याओं और उनके समाधान पर भी विचार-विमर्श हुआ। मुख्य सचिव ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि नए नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए व्यापक और व्यावहारिक कार्ययोजना तैयार की जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल नगर निगमों और नगर निकायों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अर्द्धशहरी क्षेत्रों और ग्रामीण पर्यटन स्थलों पर भी कचरे के संग्रहण, परिवहन और निस्तारण की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। इसके लिए नगर निकायों, ग्राम पंचायतों और संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारियां तय करते हुए एक ऐसा मॉडल विकसित करने पर जोर दिया गया, जिसे पूरे प्रदेश में लागू किया जा सके। पर्यटन स्थलों पर बढ़ती आवाजाही के बीच कचरे का उचित प्रबंधन पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बैठक में अधिकारियों ने बताया कि नए नियमों में निगरानी, प्रवर्तन और चालान से संबंधित प्रावधानों को अधिक प्रभावी बनाया गया है। अधिक मात्रा में कचरा उत्पन्न करने वाले प्रतिष्ठानों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने के साथ विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व यानी ईपीआर के अनुपालन पर भी जोर दिया गया है। इसके तहत संबंधित पोर्टल पर कार्रवाई का विवरण दर्ज करने, कचरे को वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित करने और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने की व्यवस्था मजबूत की जाएगी। साथ ही, कचरे को सीधे भराव स्थलों तक पहुंचाने की मात्रा कम करने और उसके उपयोगी प्रसंस्करण पर ध्यान दिया जाएगा। मुख्य सचिव ने संबंधित अधिकारियों को कचरा प्रबंधन की परियोजनाओं में तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने स्रोत पर ही कचरे को अलग-अलग करने, उसके नियमित संग्रहण, सुरक्षित परिवहन, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण की व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नियमों का पालन केवल सरकारी अभिलेखों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका प्रभाव जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए। इसके लिए नियमित निगरानी, समयबद्ध कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। नई व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए नगर निकायों, ग्राम पंचायतों और अन्य संबंधित संस्थाओं के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने के निर्देश भी दिए गए। शैक्षणिक और कौशल विकास संस्थानों में जनजागरूकता बढ़ाने तथा लोगों को कचरा पृथक्करण और पर्यावरण अनुकूल व्यवहार के लिए प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया गया। मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि सभी आवश्यक प्रावधानों को शामिल करते हुए प्रस्तावित कार्ययोजना और नियमावली तैयार कर मंत्रिमंडल के अनुमोदन के लिए प्रस्तुत की जाए। अब सबसे बड़ी चुनौती नई योजना को धरातल पर उतारने की होगी। नगर निकायों से लेकर ग्राम पंचायतों तक जिम्मेदारियां तय होने, नियमित निगरानी और नियमों के प्रभावी अनुपालन से ही उत्तराखंड में कचरा प्रबंधन की व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकेगा।