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उत्तराखंड: 27 लाख बिजली उपभोक्ताओं को राहत; विद्युत नियामक आयोग ने खारिज किया यूपीसीएल  का ₹5900 करोड़ का दावा

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देहरादून। उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने प्रदेश के करीब 27 लाख बिजली उपभोक्ताओं को एक बड़ी वित्तीय राहत दी है। आयोग ने उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा उत्तर प्रदेश से परिसंपत्तियों और देनदारियों के बंटवारे के एवज में पेश किए गए ₹5,900 करोड़ के भारी-भरकम दावे को खारिज कर दिया है। आयोग ने इस भारी भरकम दावे के मुकाबले केवल ₹389.33 करोड़ की राशि को ही जायज ठहराया है। इससे प्रदेश के आम उपभोक्ताओं पर बिजली की दरों में भारी बढ़ोतरी का मंडराता खतरा फिलहाल पूरी तरह टल गया है।

प्रदेश के करीब 27 लाख बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिली है। उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने उत्तर प्रदेश से परिसंपत्तियों और देनदारियों के बंटवारे से जुड़े यूपीसीएल के करीब 5,900 करोड़ रुपये के दावे को लगभग पूरी तरह खारिज कर दिया है। आयोग ने तमाम मदों की जांच के बाद सिर्फ 389.33 करोड़ रुपये के दावे को ही उचित माना है। आयोग ने स्पष्ट किया कि फिलहाल बिजली दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं की जा रही है। साथ ही यह सुझाव दिया गया है कि स्वीकृत राशि को यदि टैरिफ में शामिल करना जरूरी हो तो इसे एकमुश्त भार डालने के बजाय चरणबद्ध तरीके से शामिल किया जाए। मामले की सुनवाई नियामक आयोग के अध्यक्ष एमएल प्रसाद, सदस्य विधि अनुराग शर्मा और सदस्य तकनीकी प्रभात किशोर डिमरी की पीठ ने की। आयोग ने पहले मामले में जनसुनवाई भी की थी। सुनवाई के दौरान यूपीसीएल की ओर से किए गए दावे और उसके आधार की जांच की गई। आयोग ने अपने निर्णय में निगम की ओर से मामले को लंबे समय तक लंबित रखने पर गंभीर सवाल उठाए। आयोग के मुताबिक, वर्ष 2003 में परिसंपत्ति ट्रांसफर स्कीम तैयार होने के बाद यूपीसीएल वर्षों तक इस मामले को आगे नहीं बढ़ा सका। वर्ष 2013 के बाद करीब छह साल तक सीधे तौर पर कोई पत्राचार नहीं हुआ। इसके बाद वर्ष 2022 में ट्रांसफर स्कीम की अधिसूचना जारी होने के बावजूद भी मामला करीब चार साल तक आयोग के समक्ष नहीं लाया गया। आयोग ने साफ शब्दों में कहा कि निगम और शासन की ढुलमुल कार्यप्रणाली तथा प्रशासनिक लेटलतीफी का आर्थिक बोझ राज्य की जनता पर नहीं डाला जा सकता। यही वजह रही कि यूपीसीएल की ओर से मांगी गई बड़ी रकम को आयोग ने स्वीकार नहीं किया। यूपीसीएल ने कुल 5,900.01 करोड़ रुपये के अतिरिक्त एआरआर का दावा किया था। हालांकि आयोग के अनुसार इसमें वास्तविक दावा महज 936.37 करोड़ रुपये का था। शेष करीब 4,963.65 करोड़ रुपये वर्षों की देरी के कारण चक्रवृद्धि आधार पर मांगी गई कैरिंग कॉस्ट थी। आयोग ने इस कैरिंग कॉस्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया। यूपीसीएल ने परिसंपत्ति हस्तांतरण से जुड़ी विभिन्न मदों में मूल्यह्रास, इक्विटी पर रिटर्न और कार्यशील पूंजी पर ब्याज समेत अलग-अलग रकम का दावा किया था। आयोग ने सभी दावों की समीक्षा के बाद केवल कुछ मदों को ही स्वीकार किया। आयोग ने 288.70 करोड़ रुपये मूल्यह्रास, 97.75 करोड़ रुपये रीजनेबल रिटर्न और 2.88 करोड़ रुपये कार्यशील पूंजी पर ब्याज के रूप में स्वीकार किए। वहीं 4,963.65 करोड़ रुपये की कैरिंग कॉस्ट को शून्य माना गया। इस तरह कुल स्वीकृत राशि 389.33 करोड़ रुपये रही। यूपीसीएल ने केंद्र सरकार के उपक्रमों से जुड़े करीब 572 करोड़ रुपये के बकाये को राज्य सरकार की ओर से शेयर पूंजी में बदलने के आधार पर रिटर्न का दावा भी किया था। आयोग ने इस दावे को भी स्वीकार नहीं किया। इसके बाद यूपीसीएल के 5,900 करोड़ रुपये से अधिक के कुल दावे और आयोग की ओर से मंजूर राशि के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि उसके इस आदेश का मतलब तत्काल बिजली दरों में बढ़ोतरी नहीं है। स्वीकृत 389.33 करोड़ रुपये की राशि को लेकर आयोग ने सरकार के सामने विकल्प सुझाया है। यदि राज्य सरकार चाहे तो इस रकम का यूपीसीएल की ओर से सरकार को देय देनदारियों के साथ समायोजन कर मामले का निपटारा किया जा सकता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो भविष्य में यूपीसीएल के टैरिफ प्रस्तावों में इस राशि को चरणबद्ध तरीके से शामिल करने पर विचार किया जा सकता है। इससे उपभोक्ताओं पर एक साथ आर्थिक भार पड़ने की स्थिति से बचा जा सकेगा। यह मामला उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 के बाद परिसंपत्तियों और देनदारियों के बंटवारे से जुड़ा है। नवंबर 2001 में केंद्र सरकार के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड और नवगठित यूपीसीएल के बीच संपत्तियों एवं देनदारियों का बंटवारा हुआ था। 12 अक्टूबर 2003 को दोनों निगमों के बीच संपत्ति ट्रांसफर स्कीम तैयार हुई, लेकिन इसे राज्य सरकार की ओर से औपचारिक रूप से अधिसूचित होने में लगभग दो दशक लग गए। यह स्कीम आखिरकार 8 मार्च 2022 को गजट में अधिसूचित हुई। आयोग के फैसले ने फिलहाल करीब 27 लाख बिजली उपभोक्ताओं पर प्रस्तावित अतिरिक्त आर्थिक बोझ को काफी हद तक टाल दिया है। साथ ही यह संदेश भी दिया है कि प्रशासनिक देरी और संस्थागत स्तर पर लंबित मामलों की वित्तीय कीमत सीधे उपभोक्ताओं से वसूलना उचित नहीं माना जाएगा।